शनिवार, 21 मई 2011

गर्मी में तरावट व पुष्टिदायक शरबत



ग्रीष्म ऋतु रूक्ष, तपाने व झुलसानेवाली, शरीर की क्षमता व स्निग्धता को कम करने वाली होती है। इस समय शरीर को शीतलता व तरावट देने वाला आहार-विहार आवश्यक होता है। विज्ञापनों के बहकाये में आकर लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स के रूप में अपने लिये जहर खरीद लेते हैं। इन हानिकारक व दूषित डिब्बाबंद शीतल पेयों की अपेक्षा घर में बनाया गया शरबत, फलों का रस, कच्चे आम का पना एवं ताजी लस्सी शुद्ध, सात्त्विक एवं पौष्टिक होती है। अतः विज्ञापनबाजी से प्रभावित न होकर अपने धन एवं स्वास्थ्य दोनों को विनष्ट होने से बचायें। कुछ शरबत घर पर आसानी से बनाये जा सकते हैं।
नींबू का शरबतः यह पित्त विकार, मंदाग्नि, अरूचि, प्यास, उबकाई, अजीर्ण, कब्ज, और रक्त-विकार आदि दूर करता है। इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा शरीर में तरावट आती है।
विधिः नींबू के रस में ढाई गुनी मिश्री मिला के चाशनी बनायें और गरम-गरम ही छान के काँच की बोतल में भर लें। एक गिलास पानी में दो चम्मच शरबत घोलकर दोपहर भोजन के 1-2 घंटे बाद उपयोग करें।
केवड़ा शरबतः यह शीतल, कफ-पित्तशामक, विषनाशक, मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रियों के लिए बलप्रद व हृदय की तेज धड़कन को नियंत्रित करने वाला होता है। महिलाओं के अत्यधिक मासिकस्राव व गर्भस्राव में अत्यन्त लाभप्रद है।
विधिः एक लीटर पानी में 250 ग्राम केवड़े के फूल आसानी से मसल लें, फिर उसमें डेढ़ किलो मिश्री व 5 ग्राम नींबू का रस डालकर उबालें। गाढ़ी चाशनी बना के काँच की बोतल में भर लें। एक गिलास पानी में 2 चम्मच शरबत घोलकर दिन में 1-2 बार पियें।
इसी प्रकार केवड़े के स्थान पर खसखस का शरबत भी बना सकते हैं, जो गर्मी में अत्यन्त लाभकारी है।
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स्वास्थ्यकर आवश्यक बातें
नीम की 20-25 कोमल पत्तियाँ चबाकर खाने से सभी तरह के रक्त विकार शांत होते हैं।
फोड़े-फुंसियों पर नीम की पत्तियाँ पीसकर लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
नीम की दातुन करने से दाँत व मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
कच्चे आलू काटकर चेहरे पर रगड़ने से त्वचा चमक उठती है।
लू का प्रकोप नष्ट करने के लिये प्याज के रस से कनपटियों तथा सीने पर मालिश करें।
सूखा धनिया पानी में उबाल व छानकर पीने से गैस में आराम मिलता है। पेट की गर्मी से मुँह में छाले पड़ने पर चने के सत्तू को पानी में घोल के, मिश्री व घी मिलाकर पीने से छाले ठीक हो जाते हैं।
उड़द की दाल में देशी घी डालकर खाने से स्तनपान कराने वाली माताओं के दूध में वृद्धि होती है।
नीम और बेर की पत्तियाँ पानी में उबालकर उस पानी से सिर धोने से असमय बालों का झड़ना बंद हो जाता है।
पानी में सौंफ उबालकर थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहने से ज्वर की तीव्रता कम होती है।
जीरे को भूनकर चबाने से मुँह से आने वाली दुर्गंध दूर हो जाती है।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011, पृष्ठ संख्या 15, अंक 166
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दूर के ढोल सुहावने


उछलता हुआ महासागर दूर से कितना मनमोहक और भव्य दिखता है परंतु उसमें कूद पड़ेंगे तो क्या होगा ? विनाश ! आपके झरोखे से दिखती दूर-दूर तक फैली पर्वतों की श्रृंखला और जंगल की वह अपार प्राकृतिक शोभा आपकी आँखों को कैसा अदभुत आनंद पहुँचाती है ! परंतु उसी पर्वत-श्रृंखला और जंगल में पहुँचने पर वहाँ का वनवासी जीवन प्रत्यक्ष देखेंगे तो कितनी सारी तकलीफों और खतरों से भरा होता है।
सूर्य दूर से कितना देदीप्यमान, मोहक दिखता है और हमारा जीवनदाता माना जाता है परंतु उसके निकट जायेंगे तो उसमें से निकलती गर्मी से मौत ही होगी। रेगिस्तान में मृगजल का मायावी सरोवर दूर से कितना नयनरम्य दिखता है परंतु निकट जाकर देखेंगे तो वे रेत के टीले ही तो हैं !
इस तरह विश्व की स्थूल प्रकृति भी यही सिखाती है कि दृश्य या पदार्थ मात्र दूर से ही आकर्षक लगते हैं। आकर्षित होकर मजा लेने की या भोग की दृष्टि से उन्हें स्पर्श करना मुसीबत मोल लेना है। दूर से, साक्षीभाव से दृश्य या पदार्थमात्र को देखना, उपभोगदृष्टि से रहित हो यथावश्यक उनका उपयोग करना यही सही दृष्टिकोण है, जिसे प्राप्त करने पर हम भोगदृष्टियुक्त मोहक आकर्षण से मुक्त हो जायेंगे।
'मैं पुरूष' या 'मैं स्त्री' ऐसा देहाध्यास टालने का अभ्यास करते-करते आत्मानुभव में स्थित होने पर ऐसी दृष्टि सुस्थिर हो जाती है। तब आकर्षण के कामुक असर से सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। ऐसे आत्मानुभव की प्राप्ति का लक्ष्य बनाने के साथ विवेकपूर्ण चिंतन और भगवन्नाम का सहारा व्यक्ति को कामुक आकर्षण के खतरे से हमेशा बचा लेता है।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011, पृष्ठ संख्या 18, अंक 166
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आदर्श विद्यार्थी के पाँच लक्षण




आदर्श विद्यार्थी के पाँच लक्षण बताये गये हैं-
काकचेष्टा बकध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
स्वल्पाहारी ब्रह्मचारी विद्यार्थिपंचलक्षणम्।।
काकचेष्टाः जैसे कौआ हरेक चेष्टा में इतना सावधान रहता है कि उसको जल्दी पकड़ नहीं सकते, ऐसे ही विद्यार्थी को विद्याध्ययन के विषय मे हर समय सावधान रहना चाहिए। उसे समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। एक-एक क्षण का ज्ञानार्जन में सदुपयोग करना चाहिए।
बकध्यानः जैसे बगुला पानी में धीरे से पैर रखकर चलता है, उसका ध्यान मछली की ओर ही रहता है। ऐसे ही विद्यार्थी को खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ करते हुए भी अपनी दृष्टि, ध्यान विद्याध्ययन की तरफ ही रखना चाहिए।
श्वाननिद्राः जैसे कुत्ता निश्चिंत होकर नहीं सोता, वह थोड़ी सी नींद लेकर फिर जग जाता है, नींद में भी सतर्क रहता है ऐसे ही विद्यार्थी को आरामप्रिय, विलासी होकर यथेच्छ नहीं सोना चाहिए, अपितु केवल स्वास्थ्य की दृष्टि से यथोचित सोना चाहिए।
स्वल्पाहारीः विद्यार्थी को उतना ही आहार लेना चाहिए जिससे आलस्य न आये, पेट याद न आये क्योंकि पेट दो कारणों से याद आता है, अधिक खाने से और भुखमरी से।
ब्रह्मचारीः विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। आश्रम से प्रकाशित 'दिव्य प्रेरणा-प्रकाश, निरोगता का साधन' एवं 'तू गुलाब होकर महक' आदि पुस्तकों के कुछ पन्ने रोज पढ़ने चाहिए व अपने जीवन को तदनुसार बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ये दो पुस्तकें बालकों के भावी जीवन को महानता के सदगुणों से भरने में सक्षम हैं।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011, पृष्ठ संख्या 7, अंक 166
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शनिवार, 4 दिसंबर 2010

विज्ञान ने भी स्वीकार किया अध्यात्म का स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध



आध्यात्मिकता का स्वास्थ्य से गहरा संबंध है। बच्चों के मामले में तो यह बात सौ फीसदी सच साबित हुई है। फ्लोरिडा में फोर्ट लॉरलडेल स्थित नोवा साउथ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी में साइकॉलोजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बैरी नोरेनबर्ग हाल ही में किये गये धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य के बीच के संबंधों के अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुँचे कि भगवान को मानने वाले और माता-पिता व संबंधियों (अभिभावकों) के साथ मंदिर, आश्रम, गुरूद्वारे जैसे धार्मिक स्थलों में जाने वाले बच्चे ज्यादा स्वस्थ रहते हैं।
अब तक इस दिशा में हुए अध्ययन से यह तो साबित हो चुका है कि ईश्वर में श्रद्धा रखने और पूजा पाठ करने से हृदय रोग, सिरोसिस, एंफिसाइमा और दिल के दौरों की आशंका को कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समय निकाल कर मंदिर जाने और रोज प्रार्थना करने से मन को तो सुकून मिलता ही है, साथ रोगों से भी बचाव होता है। यहाँ तक कि जो बीमार होते हैं, उनके स्वस्थ होने की दर भी तेज हो जाती है। दरअसल बड़ी उम्र के लोगों पर तो इस तरह के कई अध्ययन हो चुके हैं, किंतु प्रार्थना और भगवान भरोसे का बच्चों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है, इस ओर अभी काफी कम लोगों का ध्यान गया है।
डॉ. बैरी कहते हैं- जो बच्चे धार्मिक जगहों पर जाते हैं, उनमें वहाँ न जाने वाले बच्चों के मुकाबले ज्यादा टी-सेल्य पाये गये, जो उत्तम स्वास्थ्य से संबंध रखते हैं।
धार्मिक आस्था और बीमारी के बीच संबंधों के अध्ययन के लिए इंड स्टेज ऑफ रीनल डिसीज के शिकार 6 से 20 साल के 16 बच्चों पर अध्ययन किया गया, जो डायलिसिस पर थे। आध्यात्मिकता के प्रति उनके व्यवहार व नजरिये पर उनसे सवाल-जवाब किये गये। बच्चों के जवाब को ब्लड लेवल, ब्लड यूरिया नाइट्रोजन, लिंफोसाइटस, पैराथायरॉइड हार्मोन, एल्ब्युमिन, फॉस्फोरस और यूरिया रिडक्शन रेसियो से जोड़कर देखा गया। जो बच्चे भगवान में विश्वास रखते थे, उनके ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (BUN) का लेवल सामान्य पाया गया व अन्य परीक्षणों में भी उनकी स्थिति बेहतर पायी गयी।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 10, अंक 160
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वैज्ञानिक बनने के गुण


एक बच्चे को बाल्यावस्था से ही वैज्ञानिक बनने की लगन थी लेकिन उसके विकास में सबसे बड़ी बाधा थी उसकी गरीबी। उसकी माँ ने सोचा कि गरीबी के चलते उसके पुत्र की यह अभिलाषा कभी पूर्ण नहीं हो सकती। अतः वह अपने बच्चे को एक वैज्ञानिक के पास विज्ञान की शिक्षा के लिए ले गयी।
उस वैज्ञानिक ने बच्चे के हाथ में झाड़ू पकड़ायी और प्रयोगशाला की सफाई का कार्य सौंप दिया। बच्चे ने खूब लगनपूर्वक प्रयोगशाला की सफाई की और छोटी से छोटी चीज को भी सँभालकर साफ किया और उसे उसकी जगह पर रखा। वैज्ञानिक ने बच्चे की लगन को देखकर उसकी माँ से कहाः "इसे आप मेरे पास छोड़ दीजिये। इसमें वैज्ञानिक बनने के गुण हैं, एक दिन यह अवश्य ही वैज्ञानिक बनेगा।"
दक्षता, लगन व स्वच्छता ऐसे गुण हैं जिनसे किसी भी व्यक्ति में महानता की अभिवृद्धि होती है। वही बच्चा आगे चलकर प्रसिद्ध वैज्ञानिक थामस एल्वा एडिसन बना।
जो व्यक्ति किसी भी कार्य को बड़ी लगन, सावधानी, तत्परता एवं दक्षतापूर्वक करते हैं, वे अवश्य महान कार्य करने में सफल हो जाते हैं। यदि कार्य दक्षता के साथ एकमात्र ईश्वर की प्रसन्नता पाने का लक्ष्य हो, तब तो भगवत्प्राप्ति भी सुगम हो जाती है।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 14, अंक 160
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सात्त्विक आहार और संयम लम्बी उम्र देता पर खा-खा-खा... चटोरापन और विकारी जीवन, तामसी जीवन छोटी उम्र में ही बुढ़ापा दे देता है।
जैसा संग वैसा रंग। विकारी लोगों के संग में रहेंगे तो विकारों की बात आयेगी। संतों के संग में रहेंगे तो भगवान की बात होगी।
भगवन्नाम जप में अदभुत शक्ति है और वह गुरूदीक्षा के द्वारा चेतन हो जाता है। भगवान ने तो गीध, अजामिल, शबरी को, गिने गिनाये को तारा लेकिन भगवान के नाम ने बेशुमार, अनगिनत खलों को उतार दिया।
पूज्य बापू जी
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जो जगत से सुखी होना चाहता है वह जगत से लेकर संतुष्ट होगा और जो जगदीश्वर में सुखी है वह देकर संतुष्ट होगा। कितना फासला है ! लेने वाला सब कुछ करेगा – मीठी वाणी, दाँव पेंच.... जो भी जगत से लेने की इच्छा से भरा है, वह जिस किसी से मिलेगा, कुछ न कुछ नाटकबाजी, कुछ न कुछ धोखेबाजी करके लेगा। ऐसा व्यक्ति बेईमान होता है, उस पर ज्यादा भरोसा नहीं हो पाता किंतु जो अपने-आप में संतुष्ट है, वह दूसरों को सुख, शांति, मधुरता देकर संतुष्ट होगा।
मनुष्य जीवन में ही स्वभाव सुधर सकता है। पशु योनि में बिगड़ भले जाये, सुधरता नहीं है।
पूज्य बापू जी
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पूर्ण समर्पण

माता कैकेयी की इच्छा और पिता दशरथ जी के दिये वचन को पूरा करने के लिए श्री रामचन्द्र जी वन जाने को तैयार हुए। उनकी वन जाने की बात सुनकर लक्ष्मण जी ने भी साथ चलने की आज्ञा माँगी। भगवान श्रीरामजी ने कहाः
"मातु पिता गुरू स्वामी सिख
सिर धरि करहिं सुभायैं।
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर
नतरू जनमु जग जायैं।।
'जो लोग माता-पिता, गुरु और स्वामी की शिक्षा को स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का लाभ पाया है, नहीं तो संसार में उनका जन्म व्यर्थ ही है।'
भैया ! मैं तुम्हें साथ ले जाऊँगा तो अयोध्या अनाथ हो जायेगी। माता, पिता, परिवार, प्रजा आदि सभी को बड़ा दुःख होगा। तुम यहाँ रहकर सबको संतुष्ट करो, नहीं तो बड़ा दोष होगा।"
जो भगवान का परम भक्त होता है उससे भगवान से एक पल की भी दूरी सहन नहीं होती। लक्ष्मण जी भगवान श्रीराम के परम भक्त थे, श्रीरामजी की ये बातें सुनकर कहने लगेः "हे स्वामी ! आपने मुझे बड़ी अच्छी सीख दी परंतु मुझे तो अपने लिए वह असम्भव ही लगी। यह मेरी कमजोरी है। शास्त्र और नीति के तो वे ही नर श्रेष्ठ अधिकारी हैं, जो धैर्यवान और धर्म धुरंधर हैं। मैं तो प्रभु के स्नेह से पाला-पोसा हुआ छोटा बच्चा हूँ। भला, हंस भी कभी मंदारचल या सुमेरू को उठा सकता है। मैं आपको छोड़कर किसी भी माता पिता को नहीं जानता।"
धन्य हैं लक्ष्मण जी की ईश्वरनिष्ठा ! जो माता पिता, स्वजन आदि सत्संग या भगवान के रास्ते ईश्वर, के रास्ते जाने से रोकते हैं, उनकी बात नहीं माननी चाहिए।
संत तुलसीदास जी के वचन हैं कि-
जाके प्रिय न राम – बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम,
जद्यपि परम स्नेही।।
भागवत(5.5.18) में भी कहा हैः
गुरूर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्।
दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्या-
न्न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम्।।
'जो अपने प्रिय संबंधी को भगवदभक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फाँसी से नहीं छुड़ाता, वह गुरू, गुरू नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है।'
लक्ष्मण जी ने कहा कि "यह मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, आप विश्वास करें। जगत में जहाँ तक स्नेह, आत्मीयता, प्रेम और विश्वास का संबंध वेदों ने बताया है, वह सब कुछ मेरे तो बस केवल आप ही हैं। आप दीनबंधु हैं, हृदय की जानने वाले हैं। धर्म-नीति का उपदेश तो उसे कीजिये, जिसको कीर्ति, विभूति या सदगति प्यारी लगती है। जो मन, वचन, कर्म से चरणों में ही प्रेम रखता हो, कृपा सिंधु ! क्या यह भी त्यागने योग्य है ?"
दया के सागर श्री रामचन्द्रजी का हृदय भाई के कोमल व नम्रतायुक्त वचन सुनकर छलक उठा। जब भक्त को भगवान से दूरी सहन नहीं होती तो भगवान भी उससे दूर नहीं रह सकते। उन्होंने लक्ष्मण जी को हृदय से लगा लिया और सुमित्रा मैया से आज्ञा लेकर साथ चलने की अनुमति दे दी।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 6, अंक 160
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मनुष्य जीवन की दुर्लभता और हमारा कर्तव्य - श्री दयाल जी गोयन्दका

मनुष्य जीवन बड़ा दुर्लभ है, बड़े पुण्य-संचय से भगवान की कृपा होने पर ही यह प्राप्त होता है। इसका एक-एक क्षण भगवत्स्मरण में और भगवान की सेवा में बीतना चाहिए, पर बड़े ही दुःख की बात है कि हमारा बहुत सा समय यूँ ही बीत गया और अब भी बीता ही जा रहा है।
अतः हम लोगों को अपने समय का सदुपयोग करना चाहिए, नहीं तो अंत में हमको घोर पश्चाताप करना पड़ेगा। इस विषय में श्रुति हमें चेतावनी देती हुई कहती हैः
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः
प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति।।
केनोपनिषद् 2.5
'यदि इस मनुष्य शरीर में परब्रह्म (परमात्म-तत्त्व) को जान लिया तब तो बहुत कुशल है, यदि इस शरीर के रहते-रहते उसे नहीं जान पाया तो महान विनाश है। यही सोचकर बुद्धिमान पुरुष प्राणिमात्र में परब्रह्म पुरुषोत्त्म को समझकर इस लोक से प्रयाण करके अमर (परमात्म-पद को प्राप्त) हो जाते हैं।'
इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को उचित है कि समस्त प्राणियों में परमात्मा के स्वरूप का चिंतन करते हुए अपना जीवन सफल बनाये। मनुष्य जीवनि बहुत ही दुर्लभ है, वह ईश्वर की कृपा से हमें प्राप्त हो गया है। ऐसा सुअवसर पाकर जीवन के महत्त्वपूर्ण समय का एक क्षण भी हमें व्यर्थ नहीं खोना चाहिए। जिस काम के लिए हम आये हैं, उसे सबसे पहले करना चाहिए। जो काम हमारे बिना हमारी जीवित अवस्था में दूसरे कर सकते हैं, वह काम उन्हीं से करा लेना चाहिए। उस काम में अपना अमूल्य समय नहीं लगाना चाहिए। और जो काम हमारे मरने के बाद हमारे उत्तराधिकारी कर सकते हैं, चाहे वह कैसा भी जरूरी क्यों न हो, उस काम में भी अपना अमूल्य समय नहीं लगाना चाहिए। पर जो काम हमारे बिना न हमारे जीवन काल में और न मरने पर ही दूसरे किसी के द्वारा सम्पन्न हो सकता है तथा जो हमारा इस लोक व परलोक में परम कल्याण करने वाला है और जिस काम के लिए ही हमें यह मनुष्य-शरीर मिला है एवं जिस काम में थोड़ी भी कमी रहने पर हमें पुनः जन्म लेना पड़ सकता है, साथ ही जिस कार्य की पूर्ति हमारे बिना कभी किसी दूसरे से हो ही नहीं सकती, उस काम को तो सबसे अधिक महत्त्व का और सबसे अधिक जरूरी समझकर तत्परता के साथ सबसे पहले हमें करना ही चाहिए। वह काम है परमात्मा की प्राप्ति। उसकी प्राप्ति का उपाय है ईश्वर की भक्ति, उत्तम गुणों का संग्रह, उत्तम आचरणों का सेवन, संसार से वैराग्य और उपरति, सत्पुरुषों का संग और सत्शास्त्रों का स्वाध्याय, परमात्मा के तत्त्व का यथार्थ ज्ञान, मन और इन्द्रियों का संयम, दुःखी और अनाथों की निष्काम सेवा आदि आदि। अतः मन को व्यर्थ चिंतन से हटाकर भगवान के चिंतन में लगाना चाहिए। भगवान के जप ध्यान के समय हमें जो निद्रा व आलस्य घेर लेते हैं, उनको हटाने के लिए लम्बा श्वास ले के 10-15 आभ्यंतर कुंभक व बहिर्कुम्भक करें और ॐकार का प्लुत व दीर्घ उच्चारण करें।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 5, अंक 160
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